(अरविंद कुमार की रिपोर्ट)
इस बुरे और हताशा से भरे समय में रजा फाउंडेशन ने विश्व कविता समारोह का आयोजन कर अंधेरे में एक रौशनी फैलाने का काम किया।भले ही यह रोशनी थोड़ी हो टिमटिमाती हो पर उसने जीने की उम्मीद और उल्लास को जगाया दुख और पीड़ा का बयान करते हुए प्रेम
प्रसिद्ध रंग समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा है कि हमेशा से रंगमंच का संकट मौजूद रहा है, यहां तक कि भरत मुनि के काल में भी और नाटक करने वालों के भीतर भी एक नाटक होता रहता है। उनका कहना है कि यह सच है कि एनएसडी से इब्राहिम अल्का जी के ज़माने में एक से एक दिग्गज कलाकार स
सत्ता के आगे घुटने न टेकने वाले एक समाजशास्त्री का चले जाना
आंद्रे बेते नहीं रहे। हिंदी मीडिया के लिए भले ये खबर हो या ना हो या कोई छोटी मामूली सी खबर हो लेकिन एकेडमिक वर्ल्ड में आंद्रे बेते का नहीं रहना एक बहुत बड़ी खबर है और इस बात को दीपांकर गुप्ता ,वीणा दास, अभिजीत पाठक और आनंद कुमार जैसे प्रख्यात समाज शास्त्री समझ सकते हैं जो
हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार एवम संपादक हरि भटनागर को रूस का मिख़अईल शोलअख़फ़ सम्मान देने की घोषणा की गई है।
भारत मित्र समाज, मसक्वा द्वारा भारतीय कथाकारों के लिए विशेष रूप से स्थापित यह सम्मान प्रतिवर्ष किसी एक कथाकार को दिया जाएगा।
वर्ष 2026 के लिए यह प्रथम वार्षिक सम्मान हरि भटनागर को देने का निर्णय लिया गया है।
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जब असगरी बाई ने मालिनी अवस्थी को पान का बीड़ा दिया
बीते जमाने की मशहूर शास्त्रीय गायिका असगरी बाई ने मालिनी अवस्थी को एक बार पान का बीड़ा देते हुए कहा कहा कि पान खाते समय तीन बातों का जरूर ध्यान रखना चाहिए।पहली बात तो यह कि किसी भी व्यक्ति का दिया पान नहीं खाना चाहिए और खाने से पहले सबसे पहले उसे खोलकर देख लेना चाहिए
क्या आप विश्व प्रसिद्ध अभिनेत्री और नाट्य चिंतक स्टैला एडलर को जानते हैं ?
कठपुतली कला पर डाक टिकट जारी होगा, इशारा पपेट थिएटर फेस्टिवल का 22वां संस्करण
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इशारा अंतर्राष्ट्रीय कठपुतली थिएटर फेस्टिवल का 22वाँ संस्करण 13 से 22 फरवरी 2026 तक इंडिया हैबिटैट सेंटर, नई दिल्ली में आयोजित किया जायेगा। इस वर्ष विश्वभर से आए अद्वितीय कठपुतली न
औपनिवेशिक शोषण जमींदारी उत्पीड़न व पुलिसिया दमन का दस्तावेज है ‘देहाती दुनिया’
नयी दिल्ली। हिंदी नवजारण के अग्रदूत आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास “देहाती दुनिया” के प्रकाशन के सौ साल पर आयोजित गोष्ठी में आलोचकों और वक्ताओं ने कहा कि यह उपन्यास बिहार में औपनिवेशिक ग़रीबी जमींदारी उत्पीड़न और पुलिसिया दमन का दस्तावेज है जिसके सहारे वहाँ के स