
समसामयिक सवालों पर अपनी तीखी नज़र डालने वाले रचनाकार आलोक यात्री ने देख तमाशा दुनिया का कॉलम की शुरुआत की थी... कुछ साल पहले तक लगातार आलोक यात्री ने इस सिलसिले का बरकरार रखा.. फिर इसे आगे बढ़ाने का काम किया अनिल त्रिवेदी ने... और अब एक बार फिर आपके सामने है आलोक यात्री की ताज़ा रचना... देश की मुख्यधारा की मीडिया कहे जाने वाले चैनलों और उनके महान एंकरों के

सतीश आनंद का जाना बेशक हिन्दी रंगमंच और खासकर पटना और बिहार के रंगमंच के लिए एक बड़ा शून्य पैदा करता है... बेशक तीश आनंद ने उस दौर में पटना में रंगमंच को एक नई दिशा दी और रंगकर्मियों को एक बड़ा मंच दिया जब साहित्य संस्कृति और खासकर रंगमंच एक मुश्किल दौर में था, दर्शकों को मंच तक लाना एक चुनौती थी और इसे समाज से जोड़कर एक सार्थक मिशन की तरह आगे ले जाना भी आसान नहीं था.. वो दौर था जब कालीदास

देख तमाशा दुनिया का... हमारे इस खास सेग्मेंट में इस बार वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार अनिल त्रिवेदी ने गालियों पर छिड़ी दिलचस्प बहसों और सियासत पर अपने निशाने पर ले रहे हैं .. तो पढ़िए उनका ये दिलचस्प व्यंग्य --
चाय की दुकान पर चर्चा छिड़ी है। बहस के लिए रोज कोई न कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दा मिल ही जाता है। गांव से लेकर दिल्ली की राजनीति तक और गल

अरुंधति रॉय अगर कुछ लिखती हैं तो उसके कुछ मायने होते हैं... बेशक उनका लेखन उनके निजी जीवन और अनुभवों से फूटने वाली वह अभिव्यक्ति है जो सीधे सीधे मौजूदा समाज और रिश्तों की जटिलताओं के साथ साथ समकालीन राजनीति और खासकर कट्टरवादी सियासत करने वालों पर चोट करती है... ज़ाहिर है दक्षिणपंथी ताकतों की नज़र में वो हमेशा खटकती हैं लेकिन उनके जीवन के जो उतार चढ़ाव रहे हैं, वो उन्हें एक ऐसी जीवट व

अयोध्या इन दिनों एक बार फिर ख़ासी चर्चा में है... राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट.. कहावत तो आपने सुनी ही होगी। तो साहब, राम के नाम पर पहले सत्ता और अब उनके नाम पर कई हज़ार करोड़ रुपए की चोरी.. मुद्दा गरम है, लेकिन इसी बीच राम की इसी आस्था का एक बेहद आधुनिक तकनीक से लैस व्यावसायिक अभियान भी सामने आया है... खासकर उनके लिए जिनके भीतर शायद मंदिर के दर्शन करने की चाहत है, लेकिन वो इस राजनीतिक

खुले बाजार का दौर है। आजकल हाल यह है कि बेचने वाले ग्राहक खोज-खोजकर माल थमाने में लगे हैं। बड़ा टफ कंपटीशन है, भाई। ग्राहकों को घर-घर जाकर पकड़ना पड़ रहा है। लोगों को नींद से जगा-जगाकर माल बेचा जा रहा है। बेचने वाले बताते हैं कि भैया उठो, खरीद लो और तब तक न रुको जब तक घर न भर जाए। जनता जनार्दन बेचारी झांसे में आ रही है और वह दिन-रात खरीदारी में जुटी है। विक्रेता समझा रहे हैं-मु